लोग हर पूर्णिमा पर नेपाल जाते थे, शादी-मुंडन भी वहीं होता था; पर अब डर से बॉर्डर के पास जाने की हिम्मत भी नहीं हो रही

लोग हर पूर्णिमा पर नेपाल जाते थे, शादी-मुंडन भी वहीं होता था; पर अब डर से बॉर्डर के पास जाने की हिम्मत भी नहीं हो रही


  • लालबंदी के लोगों में खौफ, यहां के हर दूसरे घर में है नेपाल की बेटी, बोले- पहली बार पता चला बॉर्डर का मतलब क्या होता है
  • गांव के 23 साल के युवक को उसके ही खेत में नेपाली पुलिस ने मार दी थी गोली, पत्नी 6 माह की गर्भवती है, दिन-रात रोती है
  • गांववाले बोले, हम मधेशी हैं और ओली पहाड़ी इसलिए वो हमारे साथ ऐसा कर रहा है

अक्षय बाजपेयी

Jul 14, 2020, 06:07 AM IST

लालबंदी. हर पूर्णिमा पर लालबंदी जानकीनगर गांव के लोग नेपाल के जनकपुर धाम जाया करते थे। खास तौर पर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे। यहां के गांववालों को तो याद भी नहीं कि कितने साल से यह परंपरा चली आ रही थी। हफ्तेभर पहले पूर्णिमा पर कोई भी शख्स नेपाल जाने की हिम्मत नहीं कर सका। उन्हें डर है कि कहीं वहां जाएं और नेपाल के सुरक्षा जवान उन पर गोली चला दें। गांव की सदियों पुरानी परंपरा टूट गई।

ये वही जगह है, जहां लालबंदी गांव के युवकों पर नेपाली की आर्मी ने गोली चलाई थी। 

लालबंदी जनकपुर गांव वही है, जहां का बेटा पिछले महीने की 12 तारीख को नेपाल पुलिस की गोली से मारा गया था। इस घटना के ठीक एक महीने बाद हम लालबंदी पहुंचे। गांव में हर कोई डरा हुआ है और नेपाल जाना तो दूर की बात है, कोई बॉर्डर के नजदीक भी नहीं जा रहा। गांव से नेपाल की सीमा बमुश्किल आधा किमी दूर है। सालों से गांव के लोग पैदल, साइकिल और अपनी बाइक से इधर से उधर आना-जाना करते रहे हैं। बॉर्डर खुली हुई है। कोई चेक पोस्ट भी नहीं है। बॉर्डर पर सिर्फ सुरक्षा जवान मिलते थे, वो भी कभी नहीं रोकते थे। अब ऐसा नहीं है।

लालबंदी की महिलाएं भी अब डरी और सहमी हुई हैं। इनमें से अधिकतर नेपाली हैं, जो शादी के बाद भारतीय हो गईं।

इस गांव के हर दूसरे घर में नेपाली लड़की ब्याही हुई है। यहां सौ से ज्यादा घरों में नेपाल की लड़कियां हैं। यहां की लड़कियों की शादी भी नेपाल में सालों से की जा रही है। पिछले महीने की घटना के बाद घरों में भी तनाव का माहौल हो गया है। पत्नियां अपने माता-पिता से मिलना चाहती हैं। भाई अपनी बहन से मिलना चाहते हैं, लेकिन कोई कहीं आना-जाना नहीं कर पा रहा।

जब हम गांव में पहुंचे तो गांव के युवक हमें बॉर्डर पर वो जगह दिखाने ले गए, जहां नेपाली पुलिस ने गोली चलाई थी और गांव के 23 साल के विकेश की मौत हो गई थी।

ग्रामीण कहते हैं रोटी-बेटी का रिश्ता है, लेकिन नेपाल की गोली ने डर पैदा कर दिया।

उन्हीं में से एक शैलेंद्र कुमार यादव ने बताया कि जिस दिन गोली चली थी, उसके ठीक एक महीने बाद आपके साथ अब हम लोग यहां आ रहे हैं। वरना पहले हर रोज यहीं पर क्रिकेट खेला करते थे, क्योंकि मैदान खुला हुआ है। कई बार सीमा पर तैनात जवान ही हमें बॉल फेंककर भी दे देते थे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि कहीं गोली न मार दें। बोले, नेपाल के लोग तो हमारे यहां तेल-राशन खरीदने आते हैं। हमारी तरफ या तो जवान रहते ही नहीं और रहते भी हैं तो कुछ कहते नहीं। लेकिन, हम नेपाल की तरफ चलें जाएं तो वहां के जवान रोक लेते हैं। हालांकि, अब कोई जा ही नहीं रहा।

विकेश की मां कैमरा देखते ही रोने लगीं। बोलीं, मेरा बबुआ बिना गलती के मारा गया।

गांव की एक और परंपरा इस बीच टूट गई। यहां जो बच्चे पैदा होते थे उनका मुंडन नेपाल में होता था। वहां एक स्थान है, जहां सदियों से लालबंदी के लोग मुंडन करवाने जाते रहे हैं। उनका मानना है कि वहां मुंडन करवाना शुभ होता है, लेकिन अब वो भी खत्म हो गया। रामछबीला ने बताया कि भैंस जब बच्चा देती है तो हम दूध चढ़ाने भी नेपाल जाते हैं। वहां हमारा एक स्थान है, जहां गांव वाले सब दूध चढ़ाते हैं। पिछले महीने हुई घटना के बाद एक दो घरों में भैंस ने बच्चा दिया, लेकिन कोई दूध चढ़ाने नहीं जा सका।

बहुत से लोग काम करनेे नेपाल भी जाया करते थे, लेकिन अब सभी गांव में ही हैं। किसी के पास काम नहीं।

जब हम गांव के युवकों के साथ भारत-नेपाल बॉर्डर पर खड़े थे, तब भी यहां से नेपाल की कई महिलाएं राशन लेकर जा रहीं थीं । हमने उनसे बात करनी चाही, लेकिन भीड़ देखकर वो बिना बात करे ही नेपाल की ओर बढ़ गईं। गांव के युवकों के साथ फायरिंग वाली वह जगह देखने के बाद हम फिर गांव में लौटे। अधिकतर बुजुर्ग, महिलाएं घरों के बाहर ही बैठे हुए थे।

हमने विकेश के पिता नागेश्वर राय से बात की तो वे बोले कि मैं 60 साल का हो गया हूं। ऐसी घटना मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी। बेटी-रोटी का रिश्ता सालों से चला आ रहा था, लेकिन उन्होंने मेरे जवान लड़के को मेरे ही खेत में भारत की सीमा के अंदर गोली मार दी।

दो साल पहले ही उसकी शादी हुई थी। उसकी पत्नी 6 माह की गर्भवती है। अब उसका तो पूरा जीवन ही बर्बाद हो गया। विकेश के जाने के बाद से वो दिनरात रोती रहती है। खाना भी कभी खाती है, कभी नहीं खाती। किसी से बात भी नहीं करती। बेटा और बहू दोनों पंजाब में रह रहे थे। विकेश वहीं सिलाई का काम कर रहा था लेकिन लॉकडाउन लगने के कारण वो गांव आया और ये हादसा हो गया। विकेश की मां और पत्नी से भी हमने बात करने की कोशिश की लेकिन वो रो पड़ीं। कुछ कह नहीं पाईं।

ये विकेश का घर है। उसके जाने से बस घरवाले ही नहीं बल्कि पूरा गांव उदास हो गया है।

गांव के ही सूरज देव बोले, उस घटना के बाद से हम सब बहुत डरे और सहमे हुए हैं। मेरी ससुराल भी नेपाल में है। पत्नी जिद कर रही है कि मां-बाप से मिलवाकर लाओ, लेकिन अब ऐसे हालात हैं कि लगता है लंबे समय तक मिलना नहीं हो पाएगा। सूरज बोले- हमें कभी ऐसा लगा ही नहीं कि हम बॉर्डर के पास रह रहे हैं और दो अलग-अलग देश हैं। आज पहली बार महसूस हो रहा है कि बॉर्डर का मतलब क्या होता है।

लालबंदी से नेपाल का नारायणपुर एकदम लगा हुआ है। वहीं अधिकतर रिश्ते हुए हैं और लोग कामकाज के लिए भी वहीं जाते थे। तनाव होने से रोजगार पर भी फर्क पड़ गया है। पहले यहां काम नहीं होता था तो वहां दिहाड़ी करने चले जाते थे, अब तो दोनों जगह से ही गए।

यहां कुछ काम है ही नहीं और वहां जा ही नहीं सकते। गांव के लोग यही चाहते हैं कि कैसे भी करके नेपाल से रिश्ते सुधर जाएं, क्योंकि उनका घर-परिवार का मामला है। गांव के संदीप यादव कहते हैं, वहां ओली सरकार है वो पहाड़ी हैं और हम मधेशी हैं। ओली हमें पसंद नहीं करता वो चीन को पसंद करता है, इसलिए वो हमारे बीच दरार डाल रहा है।



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