भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास!

कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गहरा विरोधाभास देखा जा रहा है। नवीनतम सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत की विकास दर 6.6% है। पिछले डेढ़ दशकों में अपने ही प्रदर्शन की तुलना में यह कमज़ोर है, हालाँकि वैश्विक परिदृश्य में तुलनात्मक दृष्टि से यह संतोषजनक है, लेकिन कई अन्य महत्त्वपूर्ण संसूचकों पर नज़र डालें तो अर्थव्यवस्था की स्थिति निराशाजनक लगती है।

हाल ही में जारी हुई द्विमासिक मौद्रिक नीति समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि विकास दर में कमी और निवेशक धारणा पर दबाव की वज़ह से ब्याज दरों में कमी की गई। इस नीति में ग्रामीण दबाव का उल्लेख करते हुए इसके लिये वित्तीय सहायता के तौर पर तेल की कीमतों में तेज़ी और बढ़ती मुद्रास्फीति को लेकर सतर्कता बरतने को कहा गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खाद्य और ईंधन को छोड़कर मुद्रास्फीति 5.5% प्रतिशत के उच्च स्तर पर बनी हुई है और यह पिछले 12 महीनों से ऊँचे स्तर पर ही टिकी है।

भारत की आज़ादी के बाद की यात्रा एक मामूली कृषि प्रधान देश के रूप में शुरू हुई थी। एक लंबी और श्रमसाध्य यात्रा के बाद भारत ने दो अंकीय वृद्धि दर को भी छुआ। लेकिन इधर कुछ समय से भारत की विकास दर में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और चालू वर्ष के लिये यह 7.4% से गिरकर 7% हो गई है।

विश्व बैंक अपने डेटा टेबल के लिये स्थानीय मुद्रा से जुड़े आँकड़ों का इस्तेमाल करता है जो कि हर देश जारी करता है। लेकिन सवाल यह है कि जब घरेलू एजेंसियां अपने आंकलन के तरीके में बदलाव लाती हैं तो निरंतरता बनाए रखने के लिये विश्व बैंक अपनी आंकलन पद्धति में क्या बदलाव लाता है? इसके लिये विश्व बैंक और IMF अपने विगत पूर्वानुमानों और वास्तविक आँकड़ों पर नजर रखते हैं।

भारत पर नज़र रखने वालों के लिये सबसे बड़ी चिंता का विषय देश में रोज़गार की स्थिति है। इस बारे में आधिकारिक आँकड़े जारी करने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि हालात अच्छे नहीं हैं।

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2019 नामक इस रिपोर्ट से पता चलता है कि बीते दो वर्षों में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 50 लाख लोगों ने अपना रोज़गार खो दिया है। यह रिपोर्ट CMIE द्वारा हर चार महीने पर 1,60,000 परिवारों के बीच किये गए सर्वेक्षण के अध्ययन पर आधारित है। रिपोर्ट में ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है कि लोगों के बेरोज़गार होने की मुख्य वज़ह विमुद्रीकरण है। उपलब्ध आँकड़ों से दोनों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं जुड़ता। रिपोर्ट के अनुसार, नौकरी खोने वाले 50 लाख पुरुषों में ज़्यादातर कम शिक्षित हैं।

बेरोज़गारी दूर करने के लिये चीन की तरह हमें भी श्रम प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना होगा और कुछ ऐसा करना होगा कि इनमें उद्योगपतियों की खास दिलचस्पी पैदा हो। व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ भारत को स्वाभाविक बढ़त हासिल है। चीन में बढ़ती मज़दूरी को देखते हुए हमारे लिये निर्यात बढ़ाना मुश्किल नहीं होना चाहिये था। इससे रोज़गार पैदा होते और कृषि पर भी इसका अच्छा असर होता। लेकिन निर्यात में बढ़ोतरी केवल श्रम सस्ता होने से नहीं हो जाती और निर्यात में आ रही कमी ने समस्या को और बढ़ाया है।

इसके अलावा भी कई कई अन्य चुनौतियाँ हैं- कमज़ोर और लड़खड़ाता रियल एस्टेट सेक्टर, कृषि में समस्याएँ, भारत की ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में बाहरी निर्भरता के स्तर की चिंता, चरमराता शहरी बुनियादी ढाँचा, स्थिर पूंजी प्रवाह। ये सभी अर्थव्यवस्था में मंदी की स्थिति बनाने में मदद कर रही हैं।

आर्थिक संकट को हल्का करने का एक तरीका सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण को गति देना है, क्योंकि यह अब एक स्थापित सत्य है कि राज्य के स्वामित्व वाली बैंकिंग प्रणाली के साथ संरचनात्मक समस्याएँ लगातार बनी रहती हैं। बैंकों की ब्याज दरों को कम करने से ऋणदाताओं की क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है ताकि ऋण का विस्तार हो सके और दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था में विकास को बढ़ावा मिले।

हाल के वर्षों में भारत का विकास प्रभावशाली रहा है, लेकिन हमारे विकास में स्थानिक संरचनात्मक समस्याओं का बना रहना अभिशाप समान है। भारत ने पिछले 15-20 वर्षों में जिस वृद्धि दर को निरंतर बनाए रखा है, उसे आगे भी जारी रखने के लिये बुनियादी ढाँचे, विनिर्माण और कृषि में बड़ी मात्रा में निवेश की आवश्यकता है। इसे पूरा करने के लिये एक मज़बूत वित्तीय ढाँचा तैयार करना होगा जो विकास की ओर बढ़ते भारत की ज़रूरतों और मांगों को पूरा कर सके।

(एडवोकेट ममता वशिष्ठ)
लेखिका राजस्थान महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव हैं।

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