NHAI का चेहरा सामने रखकर मौत बेचने का धंधा

एनएच 52 के अवैध कट का है मामला

जयपुर (डिम्पल शर्मा)। राजधानी में सीकर रोड नंबर 14 से रींगस तक के सर्विस रोड से NH 52 हाईवे के दोनों ओर व्यावसायिक लाभ के लिए पैट्रोल पम्प, होटल, विवाह स्थल सहित कॉलोनियों के धंधे को पनपाने के लिए हाईवे अथॉरिटी की बिना इजाजत (एक्सेस परमिशन) से सरकार के राजस्व की हानि के साथ ही दुघर्टनाओं कोबुलावा देते हैं।

अवैध कट्स की वजह से आए दिन दुघर्टनाओं से आमजन काल के ग्रास बन जाते हैं। हमारे इस मामले को लेकर एनएचएआई के अधिकारियों से बात करने पर उनका कहना था कि “हम अवैध कट हटाने के लिए समय-समय पर कार्यवाही करते हैं। लेकिन कुुुछ समय बाद वापस वहीं आलम हो जाता है।” एक अधिकारी ने दबी जुबान से नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि “ये लोग इनसे बंदी लेते हैं। साथ ही एक्सेस परमिशन की जटिलता की वजह से इनको परमिशन भी नहीं मिल पाती हैं।”

एक तरफ सरकार को राजस्व की हानि हो रही है वहीं, दूसरी ओर अवैध कट की वजह से आमजन की जान से खिलवाड़। पैट्रोल पम्प, होटल, जमीन बेचने का धंधा करने वालों के अवैध कट की वजह से हाईवे पर जाम से दुघर्टना होती रहती हैं।

जब हमने इस मामले की तह तक जाने की प्रयास  तो हमें एक तरफ जहां व्यावसायिक लोगों की ओर से लालच दिया गया वहीं, हमें डराया भी गया। एनएचएआई के अधिकारियों से बात करने पर जानकारी मिली कि एनएच 52 पर एकमात्र पैट्रोल पम्प को ही अभी तक एक्सेस परमिशन मिली हुई है। एक्सेस परमिशन नहीं मिलने की वजह पूछने पर बताया गया कि इसकी जटिलताएं ज्यादा होने के कारण इनको परमिशन नहीं मिल पाती हैं। वहीं, इसका फायदा अधिकारी अपनी जेब गर्म करने के लिए करते हैं।

पड़ताल में सामने आया है कि एक ओर जहां हाईवे एथॉरिटी चुप है वहीं, पुलिस भी हाईवे पर अवैध कट पर खड़े वाहनों को हटाने की जहमत नहीं करती है। हाईवे पर अवैध कट का इस्तेमाल बदस्तूर जारी है। इतना ही नहीं, ना तो इनको सरकार का डर है और ना ही पुलिस का।

आमजन की ओर से इनकी शिकायत और आलोचना भी की गई है। लेकिन दिखाने के लिए नाम मात्र की कार्यवाही कर इतिश्री कर दी जाती है। स्वभाविक है कि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में इस बात को भूल गए हैं कि लोगों की जिन्दगी को दांव पर रख आर्थिक लाभ तो होगा।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या एनएचएआई और पुलिस का चेहरा सामने रखकर मौत बेचने का धंधा किया जा सकता है ? सब जानते हैं कि एक्सेस परमिशन के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे में व्यावसायिक क्षेत्र के लोगों का सिर्फ अधिकारियों की जेब गर्म करने पर ही काम चल जाए तो किसका डर। यहीं ये कहावत चरितार्थ होती है कि “जब सैंया भये हो कोतवाल तो डर काहे का।

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