सरकारी डॉक्टर कर रहे हैं लाखों रुपए का काला कारोबार

एक ओर नौकरी की मोटी तनख्वाह तो वहीं दूसरी ओर निजी प्रैक्टिस करके लाखों रुपए महीना कमा रहे हैं सरकारी डॉक्टर। यानि कि आम के आम और गुठलियों के ऊंचे दाम। देश में सरकारी डॉक्टरों द्वारा अस्पतालों में निर्धारित समय पर न देखकर मरीजों के साथ अन्याय किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर अस्पतालों के पास अपने निजी चिकित्सा के अड्डे चला रहे हैं। ये सरकारी डॉक्टर यहां तक कि शाम को घर पर भी उनके घर के आगे सैकड़ों मरीजों की लाइनें देखी जा सकती हैं। जब इस बारे में गहनता से जांच की गई तो पाया कि निजी चिकित्सालय या क्लीनिक अथवा शाम को घर पर देखे जाने वाले मरीजों को कोई रसीद भी नहीं दी जा रही है।

राजस्थान में एक तरफ चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार के माध्यम से और जनता के लिए अधिक से अधिक कल्याणकारी योजनाओं को लागू कर रहे हैं तथा अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति तक भी चिकित्सा सुविधाओं का लाभ किस तरह से पहुंच सके, इस मामले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ. रघु शर्मा पूरी तरह से गंभीर नजर आते हैं। इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर, राजस्थान में कार्यरत सरकारी डॉक्टर एक तरफ तो मोटी तनख्वाह सरकार से वसूल रहे हैं और जरा-जरा सी बात पर हड़ताल तक की धमकी दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर, अस्पतालों के आउटडोर में मरीजों को पूरा समय भी नहीं देते।

लेखक अशोक भटनागर

आप किसी भी सरकारी अस्पताल या डिस्पेंसरी पर चले जाएं आपको मालूम हो जाएगा कि इसके आस-पास ही डॉक्टर साहब ने अपनी स्वयं की क्लीनिक भी चला रखी है। अगर आप शाम के समय डॉक्टर साहब के घर पर दिखाना चाहें तो मोटी फीस देकर बिना रसीद प्राप्त किए डॉक्टर साहब की सेवाएं ले सकते हैं जबकि सरकारी नियमों के अनुसार सरकारी नौकरी में कार्यरत डॉक्टरों की सरकारी समय के अलावा प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए शुल्क निर्धारित है। जो ₹50 से लेकर ₹150 तक ही है। लेकिन वास्तविकता में यह शुल्क ₹200 से लेकर ₹1000 तक प्रत्येक बार दिखाने का यह डॉक्टर्स मरीजों से वसूल रहे हैं।

इस तरह के वसूले जा रहे पैसे की कोई रसीद भी नहीं दी जाती है। इसका स्पष्ट मतलब यह है कि यह सब काला धन डॉक्टर इकट्ठा कर रहे हैं। जिसका ना खाता, ना बही है। साहब जो कहे वह सही आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि यह सबके संज्ञान में है परंतु ना तो विभाग और ना ही आयकर विभाग इस तरह के लोगों पर कोई कार्यवाही कर रहा है। लगता है पूरे कुएं में ही भांग घुल गई है। एक मरीज ने जब एक डॉक्टर से घर पर दिखाते समय वसूले गए पैसे की रसीद मांगी तो डॉक्टर के सहायकों ने उसे मारपीट कर घर से भगा दिया।

आखिर भगवान कहे जाने वाले यह लोग कब सुधरेंगे? क्या इन पर कभी लगाम लगेगी? डॉक्टरी जो कभी नोबेल पेशा हुआ करती थी अब वह पूरी तरह से कॉमर्शियल हो चुका है। हम इस बारे में राजस्थान की राजधानी में सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों की इस तरह की कार्यवाही पर पूरी नजर रखे हुए हैं। हमारी टीम गहन अनुसंधान कर रही है। शीघ्र ही इन सफेदपोशों के चेहरे से नकाब नोंच कर इनके घिनौने चेहरे को जनता के सामने बेनकाब कर देंगे।

(अशोक भटनागर)
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं “लास्ट टर्मिनल” न्यूज़ के सलाहकार संपादक हैं।

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