ग्रुप हाउसिंग के पट्टे पर राजनीतिक रसूखात का मैरिज गार्डन

ग्रुप हाउसिंग के पट्टे पर राजनीतिक रसूखात का मैरिज गार्डन

अधिकारियों की मिलीभगत एवं राजनीतिक संरक्षण के चलते नियम नजरअंदाज

जयपुर। राजधानी में एक ओर जहां राजस्थान सरकार ऐसे होटल और रिसॉर्टों में तथा विवाह घर में आग की घटनाओं को लेकर बेहद चिंतित है और विभागों के आला अफसरों को इस ओर कठोर कदम उठाने के निर्देश दे रखे हैं वहीं दूसरी ओर, यह रिसोर्ट फायर एनओसी, भूमि रूपांतरण किए बिना तथा किसी भी तरह के कोई लाइसेंस ना होने के बावजूद भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। उसके बावजूद भी जेडीए एवं नगर निगम के अधिकारियों की मिलीभगत से अधिकारी मोटा पैसा लेकर अपने संरक्षण में ऐसे लाक्षागृह बदस्तूर चलवा रहे हैं।

ऐसा ही एक मामला जयपुर में जेडीए की आवासीय योजना पत्रकार कॉलोनी मानसरोवर में देखने को मिला है। जहां राज आंगन रिसोर्ट विभागीय नियमों को धता बताकर प्रशासन की नाक की नीचे अवैध रूप से संचालित हो रहा है। यह मैरिज गार्डन कृषि और आवासीय भूमि पर चल रहा है।

इतना ही नहीं ऐसा आला अधिकारियों एवं राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते राजनेताओं के संरक्षण मे ऐसा खुलेआम कर सिस्टम को ठेंगा दिखा रहे हैं। आपको बता दें कि वर्तमान में स्थापित राज आंगन रिसोर्ट का नाम पहले रलावता हवेली था।

नहीं है फायर एनओसी

“इंवेस्टीगेशन मीडिया” की पड़ताल में सामने आया है कि इस राज आंगन रिसोर्ट के पास ना तो किसी तरह की परमिशन है और ना ही फायर एनओसी है। इसके बावजूद भी तीन से चार लाख रुपए रोज पर शादी समारोह तथा निजी पार्टी के लिए इस रिपोर्ट को किराए पर दिया जा रहा है।

ग्रुप हाउसिंग के नाम पर चल रहा है मैरिज होम

“इंवेस्टीगेशन मीडिया” की पड़ताल में सामने आया है कि यह राज आंगन रिसोर्ट ग्रुप हाउसिंग के नाम पर जेडीए में दर्ज एक बड़े भूखंड पर विवाह गृह तथा रिसोर्ट बनाकर संचालित हो रहा है। जबकि, इस पर प्रशासन के आला अफसर कार्यवाही के नाम पर कुंभकर्णी नींद सो रहे है। इन आला अधिकारियों के इस लचर रवैये से कभी भी बड़ा हादसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

बहरहाल, देखने वाली बात यह कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे इस राज आंगन रिसोर्ट ने कई सवालिया निशान खड़े कर दिए है। क्या आला अफसर इस रिसोर्ट पर कोई कार्यवाही कर आम जन में भरोसा कायम कर सकेंगे? या फिर इसी प्रकार का संरक्षण देकर आम जन व सरकार को ठेंगा दिखाते रहेंगे? आखिर इन सब पर कार्रवाई करेगा कौन? यह यक्ष सवाल आज भी मुंह बाए खड़ा है, अधिकारी आंखें मूंदे हैं क्योंकि उनको अपना अपना हिस्सा मिल जाता है।

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