आएगा तो मोदी ही, क्या बिगाड़ लेंगे छोटे अखबार

जीत के दंभ में डूबा प्रदेश भाजपा मीडिया प्रबंधन

जयपुर। प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के ​कर्ताधर्ताओं के बूते तो विधानसभा चुनावों में ही लुटिया डूब चुकी है और अब लोकसभा चुनावों में भी इनके करम तो लुटिया डुबोने वाले ही नजर आ रहे हैं। वो तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का सहारा मिला हुआ है, जिससे भाजपा की थोड़ी बहुत लाज बची हुई है और प्रदेश की लोकसभा सीटों में जीत की उम्मीद जगी हुई है वर्ना, प्रदेश भाजपा प्रबंधन का आलम तो यह है कि पिछले साल हुए उपचुनावों में जिस तरह से दो लोकसभा सीटों पर भाजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया था, उसी तरह के परिणाम मौजूदा लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिलते।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रदेश भाजपा मीडिया प्रबंधन और इसके प्रभारी केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर राजस्थान में कुछ बड़े और कुछ चहेते केवल 10—15 अखबारों को ही अखबार मानते हैं बाकि, जिले व नगर स्तर पर निकलने वाले सभी अखबार उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। इसलिए सिर्फ उन्हीं 10—15 अखबारों को भाजपा की ओर से विज्ञापन दिए जाएंगे। प्रदेश भाजपा प्रबंधन में सबसे बड़ा रोल मीडिया प्रबंधन का है। यहां प्रबंधन कम और नरेन्द्र मोदी की संभावित जीत के अहंकार में आत्मघाती कुप्रबंधन ज्यादा नजर आता है।

वैसे प्रदेश मीडिया प्रबंधन का मुख्य काम है भाजपा और प्रदेश की मीडिया के बीच बेहतर सामंजस्य बिठाते हुए जनता में पार्टी और उसके नेताओं की उत्कृष्ट छवि का निर्माण करना। इसके लिए नियमित प्रेस वार्ताएं आयोजित करना, विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं को पार्टी की विज्ञप्तियां भेजना, मीडियाकर्मियों से अच्छे सम्बन्ध स्थापित कर पार्टी के पक्ष के समाचारों का प्रकाशन कराना आदि काम मीडिया प्रबंधन के जिम्मे हैं। पार्टी के मीडिया प्लान के तहत न सिर्फ समाचार पत्र—पत्रिकाओं और चैनलों को समाचार प्रसारित करना है, बल्कि समय समय पर पार्टी के प्रचार प्रसार के विज्ञापन भी जारी करना है।

भाजपा सूत्रों के अनुसार, लोकसभा चुनावों में प्रदेश मीडिया प्रबंधन ने किसी प्रकार का न तो अपना कोई मीडिया प्लान बनाया है और न ही कोई काम सम्पादित किया जा रहा है। कहने को तो केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर प्रदेश भाजपा के प्रभारी और सुधांधु त्रिवेदी सह प्रभारी के रूप में मीडिया प्रबंधन को भी लीड कर रहे हैं, लेकिन सभी लोग सिर्फ इसी आस में बैठे हैं कि आएगा तो मोदी ही। फिर चाहे कोई साथ हो या ना हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।

गौरतलब है कि प्रदेश में अनेक छोटे—बड़े समाचार पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं। इनमें से कई प्रदेश स्तरीय हैं तो कई अपने जिले व नगर तक ही सीमित हैं। जो प्रदेश स्तरीय हैं, उनकी प्रसार संख्या अधिक होने के कारण सभी जगह दिल्ली तक में नजर आते हैं, लेकिन जो जिला या नगर स्तरीय हैं और दिल्ली तक नजर नहीं आते। उन्हें प्रदेश का मीडिया प्रबंधन समाचार पत्र ही नहीं मानता। जबकि, ये पत्र अपने क्षेत्र विशेष में खासी पकड़ रखते हुए कई जगह लीड भी करते हैं।

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मामला यह है कि प्रदेश के सभी छोटे बड़े समाचार पत्रों ने प्रदेश मीडिया प्रबंधन को लोकसभा चुनाव के प्रचार के विज्ञापन के प्रस्ताव भेजे तो उन प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में पहुंचा दिया गया। जो भी विज्ञापन भाजपा की ओर से जारी किए गए, वे सिर्फ बड़े अखबार समूहों को और वह भी दिल्ली से जारी किए गए। प्रदेश भाजपा मीडिया प्रबंधन ने पूरी तरह से अपनी इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए गेंद प्रदेश भाजपा प्रभारी प्रकाश जावडेकर के पाले में फेंक दी। वहीं जब लघु समाचार पत्रों का एक प्रतिनिधिमंडल बुधवार को जावडेकर से मिला और उनसे अपनी विज्ञापन की फरियाद की तो जावडेकर ने भी टका सा जवाब देते हुए कह दिया कि सिर्फ दस पन्द्रह अखबारों को ही विज्ञापन दिए जाएंगे और वह भी दिल्ली से।

प्रदेश भाजपा मीडिया प्रबंधन की गैर जिम्मेदारी देखिए कि उन्होंने पिछले एक माह से अनेक लघु समाचार पत्र प्रकाशकों को कार्यालय के चक्कर लगवाए और अब एकाएक अपमानजनक तरीके से ठेंगा दिखा दिया। जावडेकर से मिले प्रतिनिधिमंडल को इस अपमान पर आपत्ति ज्यादा है। उनका कहना है कि उन्हें पहले ही यह कह दिया जाता कि इस बार विज्ञापन नहीं दिए जाएंगे तो ठीक रहता। पहले तो उन्हें विज्ञापन के झांसे देते हुए उनके विज्ञापन के लेटर इकट्ठे कर लिए और उन्हें अनेक चक्कर खिलवाए। उन्हें भाजपा की विज्ञप्तियां तो रोजाना छापने को दे दी जाती है, लेकिन विज्ञापन के मामले में उन्हें छोटा व महत्वहीन करार दिया गया है।

जानकारी तो इस बात की भी मिली है कि प्रदेश मीडिया प्रबंधन को समय समय पर मीडियाकर्मियों को सैट करने के लिए गुप्त लिफाफे के लिए बड़ी राशि भी दी जाती है, लेकिन इस राशि में से कुछ चुनिंदा मीडिया​कर्मियों को ​कुछ राशि बांटकर शेष हजम कर ली जाती है। जिससे भी मीडियाकर्मियों में मीडिया प्रबंधन और पार्टी की साख पर बुरा असर पड़ा है।

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