आरक्षण की समीक्षा से ही मिटेगा जाति एवं वर्ग भेद

समय और शिक्षा के साथ हमारे समाज की सोच-विचार, रहन-सहन, खान-पान में बहुत बदलाव आ गया है। वर्तमान समय में लोगों के व्यवसाय, पहनावा, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान को देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि किसकी कौनसी जाति है। फिर भी हमारे देश में जातियोंं के आधार पर अलग-अलग आरक्षण दिया जा रहा है। जैसा की सभी जानते हैं कि आजादी से पहले हमारे समाज में उच्च और निम्न जातियां थीं। समाज में जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता था। निम्न जाति वालों को हीन भावना के साथ देखा जाता था।

संविधान निर्माताओं ने सामाजिक एकरसता लाने के लिए, आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को समाज के अन्य वर्ग के समकक्ष बनाने के लिए जातियों के अनुसार उनको एससी, एसटी इत्यादि वर्ग में बांटा और उनको प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में आरक्षण दिया गया। जिससे वह वर्ग आरक्षण रूपी बैशाखी का सहारा लेकर प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में अपने को स्थापित कर सके और सशक्त बने, जिससे वह वर्ग समाज के अन्य वर्ग के समकक्ष बने। जिससे समाज में छूआछूत और वर्ग भेद समाप्त हो जाए।

प्रारम्भ में यह आरक्षण 10 साल के लिए दिया गया था, 10 साल बाद इसकी समीक्षा की जानी थी। आरक्षण का लाभ लेकर इस वर्ग के लोग प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में उच्च पदों पर आ गए। उनके साथ समाज मे किसी प्रकार का भेदभाव एवं छूआछूत नहीं किया जाता। इसके अलावा इस वर्ग के कुछ लोग अधीनस्थ सेवाओं में आ गए या अन्य छोटे पदों पर आ गए। वर्तमान समय में उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता लेकिन, यहां एक अहम बात और है कि आरक्षण का लाभ उन्हीं लोगों को मिल रहा है जिन्होंने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया।

उन्हीं परिवारों की 2-3 पीढियां लगातार आरक्षण का लाभ ले रही हैं तो कुछ परिवारों ने एक बार भी आरक्षण नहीं लिए। उन लोगों की आज भी समाज में दयनीय स्थिति है एवं वर्तमान व्यवस्था के तहत जो लोग अब तक आरक्षण लेकर ऊंचे पदों पर बैठे हुए हैं वो ही लाभ ले पाएंगे। हालांकि, वो आर्थिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक स्थिति में सम्पन्न हैं और आरक्षित वर्ग का निचला तबका है वो इनके साथ प्रतियोगिता में कहीं भी नहीं ठहरता, इस कारण इनकी स्थिति सदा ऐसी ही रहेगी।

 

इसी प्रकार समाज के उच्च वर्ग में अधिक पढ़े लिखे लोगों में एक अलग किस्म का भेदभाव पनपने लगा है। उनके दिमाग में यह घर करता जा रहा है कि हमारा योग्य होने के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं हो पाता और आरक्षण के कारण कम योग्यता वालों का प्रवेश हो जाता है। इसी तरह राजकीय सेवा में भी आरक्षण के कारण उन्हें नौकरी मिलने के साथ ही उनकी पदोन्नति भी हो जाती है और हम योग्य होने के बाद भी रह जाते हैं साथ ही अयोग्य व कनिष्ठ व्यक्तियों के अधीन कार्य करना पडता है। इस प्रकार समाज में वे भी एक-दूसरे से ईर्ष्या की भावना रखते हैं।

अत: आज समय और परिस्थितियों की मांग है जो लोग प्रशासनिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में उच्च पदों पर हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं उनका आरक्षण तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जावे जिससे आरक्षण से वंचित लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके वहीं दूसरी ओर, सवर्णो में भी जो अति गरीब है उनकी स्थित आरक्षित वर्ग के आरक्षण से वंचित व्यक्तियों के समकक्ष या कुछ बेहतर है, लेकिन जिन्हें आरक्षण का लाभ मिला हुआ है उनसे बहुत निम्न हैं।

अत: इन दोनों वर्ग को मिलाकर एक अलग वर्ग जिसमें जाति शब्द नहीं जोड़ा जाए उनके लिए एक अलग शब्द जैसे भारतीय या अन्य नाम दिया जाए। ऐसा करने से समाज में वर्ग एवं जाति-भेद, ऊंच-नीच की भावना समाप्त होगी एवं सामाजिक समरसता बढ़ेगी। वैसे भी संविधान द्वारा आरक्षण 10 साल के लिए दिया गया था, 10 साल बाद इसकी समीक्षा की जानी थी। लेकिन आज 69 वर्ष के बाद भी इसकी समीक्षा नहीं की गई।

रेणु शर्मा

(लेखिका गीतांजलि पोस्ट की प्रधान सम्पादक हैं)

सभी अपडेट के लिए हमें Facebook और Twitter पर फ़ॉलो करें

राष्ट्र निर्माण में सहयोग के लिए करें. (9887769112)
हमारी स्वतंत्र पत्रकारिता को सरकार और कॉरपोरेट दबाव से मुक्त रखने के लिए आर्थिक मदद करे



Leave a Comment