एक ओर करोड़ों, दूसरी ओर ठेंगा

भाजपा की विज्ञापन नीति का दोहरापन

जयपुर। लोकसभा चुनावों में जहां एक ओर करोड़ों लोगों को रोजगार देने का वायदे करने वाली मोदी सरकार ने बडे चैनल व अखबारों को करोड़ों के विज्ञापन जारी किए हैं वहीं दूसरी ओर, छोटे व मंझले अखबार वालों को विज्ञापन न देकर किया बेरोजगारी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

सरकार के सबसे नजदीक रहने वाला व सबसे नजदीक जीने वाला तबका मीडिया खुद भुगत रहा है सरकार को। आखिर यह मीडिया सरकार की ओर से किए जा रहे वादे व इनके घोषणा पत्र को लागू कैसे कराएगा। जो अपनी पीड़ा खत्म नहीं कर पा रहे हैं वह सरकार की ओर से जनता से किए जा रहे वादों की क्या पालना करवाएगा।

मामला लोकसभा चुनावों का है। जहां भाजपा के प्रधानमंत्री व भाजपा के मुखिया अमित शाह गांव-गांव व ढाणी-ढाणी के लोगों को रोजगार देने का वादा कर रहे हैं वहीं, गांवों से रोजगार की तलाश में निकले हुए ये छोटे व मंझले मीडिया के मालिक दो जून की रोटी की तलाश में धक्के खाने को मजबूर हो रहे हैं।

विगत पांच वर्षों में सरकार ने जहां करोड़ों के बजट गांव पर खर्च किए हैं वहीं गांवों से निकले ये लघु अखबारों के मालिक व पत्रकार सरकार का मुंह ताक रहे हैं। ये सोच रहे थे कि मोदी सरकार की हठधर्मिता के कारण इनको विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं। लेकिन, इस लोकसभा चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी भी गांवों से निकले इन लघु अखबारों के मालिक व पत्रकारों को भी भूल गई है।

उल्लेखनीय है कि, भारत के राष्ट्रपिता गांधीजी ने लघु व कुटीर उधोगों को बढाने पर जोर दिया था। क्योंकि, स्वतंत्रता आंदोलन में इन लघु व मंझले अखबारों ने ही अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम छेडी थी जिसमें राष्ट्रपिता गांधीजी का अखबार भी शामिल था।

अब राजस्थान में हजारों की तादाद में चल रहे ये मीडिया के छोटे व मंझले अखबारों के मालिक व पत्रकार आखिर जनता को इस मोदी सरकार के बारे में क्या बताए। क्या भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा भी मोदी की विचारधारा हो गई है जो इन मंझले व छोटे अखबारों को हजारों का विज्ञापन भी नहीं दे रही है। जबकि, बडे मीडिया हाउस व अखबारों को करोड़ों के विज्ञापन जारी हो चुके हैं।

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